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नफ़रत की राजनीति और वैश्विक स्तर पर हिंदुओं की बढ़ती असुरक्षा

 

नफ़रत की राजनीति और वैश्विक स्तर पर हिंदुओं की बढ़ती असुरक्षा

एक समय था जब भारत की पहचान विविधता में एकता के रूप में होती थी। दुनिया भर में रहने वाले भारतीय—चाहे किसी भी धर्म के हों—आपसी भाईचारे, सांस्कृतिक मेल-जोल और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए जाने जाते थे।

छठ पूजा, दिवाली, होली जैसे त्योहार अब केवल भारत तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पूरी दुनिया में मिल-जुलकर मनाए जाते थे। विदेशी नागरिक भी इन आयोजनों में सहयोग करते थे।

दुनिया में हिंदू पहले सुरक्षित क्यों थे?

दुनिया में अल्पसंख्यक होने के बावजूद हिंदू समुदाय अपेक्षाकृत सुरक्षित था। उन्हें सम्मान, रोजगार और शिक्षा के समान अवसर मिलते थे। विदेशों में रहने वाले हिंदू मान-सम्मान के साथ जीवन यापन कर रहे थे, उनके बच्चे पढ़ाई कर रहे थे और सामाजिक सौहार्द बना हुआ था।

कथित राष्ट्रवाद और उसके दुष्परिणाम

लेकिन भारत में कुछ कथित हिंदूवादी संगठनों ने राष्ट्रवाद के नाम पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत, हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा दिया। धर्म और जाति के आधार पर हमले लगातार बढ़ते चले गए।

इसका असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा। पूरी दुनिया में भारत की छवि प्रभावित हुई और इसका खामियाजा विदेशों में रहने वाले आम हिंदुओं को भुगतना पड़ रहा है।

नस्लवादी हमले और भारतीयों की हत्या

अब स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई देशों में नस्लवादी हमले सामने आ रहे हैं। दूसरे राज्यों और देशों में काम करने वाले भारतीय नागरिकों की हत्या तक की घटनाएं हो रही हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन घटनाओं पर खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले संगठनों की चुप्पी बनी हुई है।

नफरती भाषण और साधुओं की भूमिका

कुछ साधु-संतों द्वारा दिए जा रहे नफरती और भड़काऊ बयान समाज में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इन बयानों पर समय रहते रोक न लगाना सामाजिक सौहार्द को कमजोर कर रहा है।

भारत सरकार की जिम्मेदारी

भारत सरकार को चाहिए कि वह धार्मिक, जातीय और साम्प्रदायिक हिंसा पर तुरंत और सख्त कार्रवाई करे। अगर समय रहते इस पर काबू नहीं पाया गया, तो भारत धीरे-धीरे दुनिया से अलग-थलग पड़ सकता है।

इसका नुकसान किसी एक पार्टी या संगठन को नहीं, बल्कि पूरी भारतीय जनता को होगा— चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से क्यों न हो।

नफ़रत नहीं, इंसानियत की ज़रूरत

लगातार बढ़ती धार्मिक और जातीय हिंसा ने लोगों को एक-दूसरे के धर्म और समुदाय से नफरत करना सिखा दिया है। यह किसी भी राष्ट्र के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है।

अब समय आ गया है कि नफरत की राजनीति को रोका जाए, संविधान के मूल्यों को मजबूत किया जाए और इंसानियत को धर्म से ऊपर रखा जाए।

तभी भारत फिर से विश्व में शांति, सहिष्णुता और भाईचारे का उदाहरण बन सकेगा।

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