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थावे मंदिर चोरी कांड: मीडिया का शोर अचानक क्यों थम गया?

 


बिहार के प्रसिद्ध थावे मंदिर में हुई चोरी को लेकर कुछ दिन पहले तक सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया में ज़बरदस्त हंगामा देखने को मिला। हर तरफ बहस, आरोप और ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी। लेकिन अब सवाल यह है कि आज वही मामला मीडिया से लगभग गायब क्यों हो गया?

शुरुआती रिपोर्टिंग में क्यों जोड़ी गई जाति?

जब इस चोरी के मामले में आरोपी का नाम सामने आया और उसे “राय” बताया गया, तो बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के सोशल मीडिया और कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने आरोपी को यादव जाति से जोड़ना शुरू कर दिया।

इसके बाद:

सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग शुरू हुई

जातिगत टिप्पणियां की गईं

कुछ मीडिया संस्थानों ने TRP और व्यूज़ के लिए आग को और भड़काया

सच सामने आया, तो खबरें क्यों हटीं?

जैसे ही जांच में यह स्पष्ट हुआ कि आरोपी भूमिहार जाति से है, उसी समय:

मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज़ बंद हो गई

सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट होने लगीं

जाति का ज़िक्र पूरी तरह गायब हो गया

यह सवाल उठना लाज़मी है कि अगर आरोपी यादव होता, तो क्या मीडिया इतनी जल्दी शांत हो जाती?

क्या मीडिया निष्पक्ष है?

यह मामला अब सिर्फ थावे मंदिर चोरी का नहीं रह गया है,

बल्कि यह बन गया है:

मीडिया की चयनात्मक रिपोर्टिंग का उदाहरण

जाति देखकर खबर चलाने की मानसिकता का

और सच सामने आने पर चुप्पी साध लेने का मामला

आज जनता यह पूछ रही है कि क्या मीडिया:

सिर्फ कुछ जातियों पर ही सवाल उठाती है?

या फिर सच्चाई से ज़्यादा एजेंडे को प्राथमिकता देती है?

समाज से अपील: सच को सामने लाएं

यह लेख किसी समाज के खिलाफ नहीं है।

यह लेख निष्पक्षता और सच्चाई की मांग है।

👉 सभी लोगों से अपील है कि

👉 गलत नैरेटिव का विरोध करें

👉 सच को साझा करें

👉 और यह सवाल उठाएं कि मीडिया ने पूरी सच्चाई क्यों नहीं दिखाई

निष्कर्ष

चोरी करने वाला व्यक्ति अपराधी होता है,

उसकी कोई जाति नहीं होती।

लेकिन जब मीडिया:

जाति देखकर खबर चलाए

और सच सामने आने पर चुप हो जाए

तो सवाल सिर्फ अपराध का नहीं,

पत्रकारिता की साख का बन जाता है।

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